बंगाल की राजनीति में भाजपा का सफर जबरदस्त राजनीतिक उतार-चढ़ाव की कहानी है। सीमित प्रभाव से धीमी शुरुआत हुई। बीच में लंबा ठहराव आया और फिर एक दशक के बाद बढ़ी लोकप्रियता ने उसे सत्ता के सबसे बड़े दावेदार के रूप में खड़ा कर दिया है।
लंबे समय तक राज्य की राजनीति में हाशिए पर रही और शहरी क्षेत्र तक थोड़ा असर रखने वाली भाजपा ने एक दशक में अपने वोट प्रतिशत और राजनीतिक प्रभाव दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि की। यही वजह है कि 2016 के विधानसभा चुनाव में महज तीन सीटों पर सिमटी भाजपा 2021 के चुनाव में लंबी छलांग लगाते हुए 77 सीटें हासिल कर राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई।
2014 लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। पार्टी का वोट बढ़कर 17 प्रतिशत पहुंचा और दो लोकसभा सीटें भी जीतीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 18 सीटें और करीब 40 प्रतिशत वोट हासिल किए। 2016 में मिले महज 10 प्रतिशत वोट के मुकाबले 2021 में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़कर 38 प्रतिशत पर पहुंच गया। मुख्य विपक्षी दल के रूप में उदय के साथ पार्टी ने खुद को तृणमूल के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया। उससे पूर्व 2001, 2006 और 2011 के चुनाव में पार्टी का यहां खाता तक नहीं खुला था। 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए राज्य की 42 में से 18 सीटें और करीब 40.06 प्रतिशत वोट हासिल कर सबको चौंका दिया था। बंगाल में शून्य से शुरुआत करने वाली भाजपा आज न केवल सत्ता के करीब पहुंच चुकी है, बल्कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के सामने मुख्य चुनौती के रूप में खड़ी है।
वामपंथी शासन के खात्मे के बाद उभार
बंगाल में 2011 के चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल की ऐतिहासिक जीत और लगातार 34 साल से सत्ता पर काबिज वाम मोर्चा शासन के पतन के बाद भाजपा की लोकप्रियता शुरू हुई। 2011 में सत्ता से बेदखल होने के कुछ ही वर्षों के भीतर वामपंथी दल हाशिए पर चले गए और भाजपा प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी।
माना जाता है कि वाम मोर्चा और कांग्रेस का वोट बैंक पूरी तरह भाजपा और तृणमूल में शिफ्ट हो गया।सीमित उपस्थिति और गठबंधन का दौरशुरुआती दौर में भाजपा का यहां जनाधार सीमित था, लेकिन 1999 से 2001 के बीच तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन ने उसे बंगाल की राजनीति में पहचान और जमीन दी।
इस दौर में पार्टी का वोट आठ से 11 प्रतिशत के बीच रहा। तृणमूल द्वारा साथ छोड़ने के बाद 2004 से 2009 की अवधि में भाजपा का वोट घटकर छह से आठ प्रतिशत तक आ गया। उस समय राज्य की राजनीति मुख्यत: वाम दलों और तृणमूल के बीच सिमट गई, जिससे भाजपा का विस्तार रुक गया।

