अपनी जल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अन्य राज्यों पर निर्भर राजधानी दिल्ली भविष्य की जरूरतों को लेकर गंभीर नहीं दिख रही है। न तो वर्षा जल संचयन पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है और न ही उपचारित पानी के उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है। पानी की बर्बादी भी नहीं रुक रही है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का अवैध दोहन हो रहा है।
इससे राजधानी में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली ”डे जीरो” की ओर बढ़ रही है। एनसीआर के अन्य शहरों की स्थिति भी चिंताजनक है। यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो भविष्य में समस्याएं और बढ़ेंगी।
दिल्लीवासियों के जीवन को खतरे में डाल रहा
राजधानी में लगभग 1250 मिलियन गैलन प्रतिदिन (एमजीडी) पानी की आवश्यकता है। इसकी तुलना में मात्र 1000 एमजीडी पानी उपलब्ध है। यानी 250 एमजीडी कम पानी मिल रहा है। उपलब्ध पानी में से भी लगभग आधा चोरी या रिसाव के कारण बर्बाद हो जाता है। इस स्थिति में अवैध भूजल दोहन और बढ़ रहा है। भ्रष्ट व लापरवाह तंत्र तथा गिरते भूजल स्तर के कारण दिल्ली गंभीर संकट की ओर बढ़ रही है। पिछले वर्ष अगस्त में दिल्ली विधानसभा में भी यह मामला उठा था। भाजपा विधायक जितेंद्र महाजन ने विधानसभा में कहा था कि यह संकट दिल्लीवासियों के जीवन को खतरे में डाल रहा है।
देश के कई महानगरों पर संकट
विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली सहित देश के कई अन्य शहरों की स्थिति खराब है। यदि इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो इन शहरों का भूजल खत्म हो जाएगा, जिससे पेयजल संकट और गहरा जाएगा। सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व के कई शहर ‘डे जीरो’ की स्थिति में पहुंच सकते हैं, जिसमें भारत के दिल्ली, जयपुर, चेन्नई और हैदराबाद जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं।
85 प्रतिशत पानी नालों में बेकार बह रहा
संयुक्त राष्ट्र ने भी दिल्ली व चेन्नई को ‘डे जीरो’ की चेतावनी दी है। भूजल संकट से जूझ रहे विश्व के कई शहरों में दिल्ली शामिल है। ”डे जीरो” का अर्थ है कि शहर में उपलब्ध पानी के सभी स्रोत समाप्त हो जाना। इस स्थिति से बचने के लिए भूजल दोहन में कमी लाकर वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना होगा। दिल्ली में हर वर्ष औसतन 774.4 मिलीमीटर वर्षा होती है, लेकिन वर्षा जल संचयन की उचित व्यवस्था न होने के कारण इसमें से लगभग 85 प्रतिशत पानी नालों में बेकार बह जाता है। इसमें सुधार की आवश्यकता है।